Archive for the ‘tamnna’ Category

SACHCHI HAI MUHABBAT KA….!!!

जुलाई 6, 2010


कितना दिल लगाने से पहले, इत्मिनान किया मैंने ,
सच्ची है मुहब्बत ‘का’ फिर भी इम्तहान दिया मैंने ॥

कहने को तो मुहब्बत करना, गुनाह है इस जहाँ में ,
फिर भी करके मुहब्बत ,किया सबको हैरान मैंने ॥

हमारे इश्क की चर्चा है, शहर के ह़र मोड़ पर ,
इस तरह सारे शहर को, किया परेशान मैंने ॥

न छूटे दिल की लगी ,तेरी दिल-लगी में कहीं ,
कितना तेरे लिये दिल ,लगाना किया आशां मैंने ॥

तुझसे माँगा न कभी, तेरी चाहत के सिवा ,
तेरी चाहत की राहों में , सब किया कुर्बान मैंने ॥

न कभी तेरे जज्बात फिसले ना, फिसला दिल तेरा ,
इसी जज्बे का ”कमलेश ” अहसान खुद लिया मैंने ॥

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विचारो के उत्तेज से..!!

मई 6, 2010


सम्वेदनाओं के शून्य को ,जगाना चाहता हूँ !
विचारो के उत्तेज से ,हलचल मचाना चाहता हूँ !

मर्म को पहचान, चोट करारी होनी चाहिए ,
बंद आँखों को नींद से ,जगाना चाहता हूँ !
…!!
खून की गर्म धारा ,बह रही ही जिस्म में ,
देश-भक्ति का इसमें ,उबाल लाना चाहता हूँ !

जज्बों में ना कमी हो तो ,समन्दर भी छोटा है ,
,आसमां में अपना तिरंगा फहराना चाहता हूँ !

कमी नही इस देश में, बौद्धिक शारीरिक बल की ,
‘कमलेश’ इसे विश्व शीर्ष पर पहुंचाना चाहता हूँ !!

बेवफाई का …….!!

जनवरी 22, 2010

बेवफाई का अहसास इन ,
हवावों में क्यों है तारी ।

क्या किसी भरोसे को फिर,
तोड़ने की है बारी ।

पहले के जख्म अभी सूखे भी नही ,
फिर क्या दूसरे जख्मों की है तय्यारी ।

करते रहे इलाज जिस्म के दागों की ,
आखिर में पता चला ये,,तो दिल की है बीमारी।

छुड़ा कर चाहे दामन,चले जाना तुम ,
पर तुमसे पहले जाने की मेरी है बारी।

मेरी कशिश दिल में रहे बाकी तेरे ,
रहेगी आखिरी वक्त तलक कोशिश है हमारी।

‘कमलेश ‘न होना शर्मिंदा किसी के सामने ,
जो भी गुजरा उसकी मेरी है जिम्मेदारी।

दिल उदास है …!!!

नवम्बर 7, 2009

कहूँ मै क्या ?दिल उदास है ,


कोई ऐसी बात मौका खास है


कोने में खिन दिल के किसी ,


इक उलझाउलझा सा अहसास है


किसे समझूं यहाँ अपना ,


तोड़ देता हर कोई विश्वाश है


कसम से पड़ता इस अजाब में ,


हो गया सकूनेदिल का नाश है


फ़िर भी शुक्र है खुदा का ,


टूटे दिल का टुकडा मेरे पास है


‘कमलेशमिल जाएगा ही कोई,


अपना कोई कोई हमराह है

कौन होना ..?

अक्टूबर 13, 2009

कौन होना चाहता है

यहाँ बेआबरू

ये वक्त ही है ,
बेशर्म बना देता है

हसरत मुझे भी थी,

आसमान छूने की ,

वक्त ,कोशिशों की सीढ़ी को ,

बेवक्त गिरा देता है

संभलसंभल कर बढ़ रहे थे ,

जानिबेमंजिल ,

जो कभी खत्म हो राह ,

वक्त,पकडा वो सिरा देता है

टूटते हौंसलों को ,

कैसे सम्भालेकमलेश” ,

बसे बसाये घरौंदों पर ,

वक्त बिजली गिरा देता है ,

हिम्मत से तोड़ दोगे

वक्त के हौसले ,

वक्त ही देखो ?

जिन्दगी को मशविरा देता है