Archive for the ‘दिल की . .’ Category

vishwas ki in daliyon ko…..!!

जुलाई 31, 2011

विश्वास की इन टूटती डालियों को ,
कोई तो उठ के सहारा दे दो ,

छोडो ना इनको भाग्य के भरोसे ,
बस साथ होने का इशारा दे दो ,

पहुँच कर रहेंगे ये अपनी मंजिल तलक ,
पूरी राह नही ,बस चलने को किनारा दे दो ,

ये भर कर रहेंगे दिलों में उजालों की बिजलियाँ ,
बस इनको विश्वास का इक शरारा दे दो ,

जुल्म की सत्ता हटाने की हमको नही जरूरत ,
बस शान से जीने का हक हमारा दे दो ,

तन मन धन से हम हैं इनके साथ सब ,
बस ‘कमलेश , इस अहसास का हुलारा दे दो ॥

zindgi ka har mod ….!!

जून 20, 2011

हर मोड़ जिंदगी का लगे  , है इक सीधा रास्ता ,
जिसके हर मोड़ से लगे ,है  सीधा वास्ता  ,

उन लम्हों को सजा रखा है, दिल के फूलदानों में ,
हसरतों ने महफूज़ किया ,जिन्हें   वक्त के तूफानों में ,

नजर भर कर देखें  तो कहते ,क्या हुआ प्यार है ,
ना देखा जब उस नजर से ,तो हुआ  जीना दुश्वार है ,

इस कदर हो बंदिशें जमाने की, जिन्दगी जीने पर ,
तो जमाना  क्यों हलकान होता है, हमारे पीने पर ,

मिले सबको किसी की चाहत ,ये नही कोई जरूरी है ,
दुनिया में कितनो की अब तक, हसरत रही अधूरी है ,

‘कमलेश’ कभी वक्त की कश्ती रुकी नही  किनारे पर ,
किनारा खुद आ मिले कश्ती को, वक्त के इशारे पर ॥

kyun ! khelte hain dil se..?

फ़रवरी 28, 2011


क्यूँ ?खेलते हैं दिल से ,इस जहाँ के लोग ,
ये इतने हैं बेदर्द !ये हैं कहाँ के लोग !!?

रखते नही लिहाज़ जरा भी, मुहब्बत के का ,
रुतबा दिखाते हैं हमेशा, अपने झूठे गरूर का

गर नही चला जाता था मंजिलजानिब ,
तो क्यों ?मेरी तरफ हाथ बढ़ाना जरूर था

बस अपना हो मकसद हासिल,ये तेरी सोच थी ,
इसमें मंजिल का नही ! सोचका ही कसूर था

कमलेशदेखेगी दुनिया प्यार के, नाम को इस तरह ,
कहेगी !! ये तो प्यार नहीं दिमागेफितूर था

jab bhi hua ishara…!!

नवम्बर 3, 2010
 जब भी हुआ इशारा, उस परवर -दिगार का ,
 बरसीं रहमतें आसमां से ,झरना बहा प्यार का ॥

 उसकी रज़ा से दिए आँधियों में जलते हैं ...
 हो ना रजा तो मजाल आ जाये झोंका 'बयार का '' ॥

 ये चमकती शबनम चहकती बुलबुल ,है उसी का नज़ारा  ...
 उसके इशारे से पत्थरों में , चहक रहा  दरख्त चिनार का ॥

 समंदर भी सूख जाये जब वो चाहे तब ......../
 नहीं संभल पाता इन्सान बोझ  अपने दरो-दीवार का ''॥

 कमलेश ''वो ही जाने उसकी कायनात का जलवा ,
 बस बनी रहे इनायत  है सपना इस खाकसार का ''॥

man ki pyas…!!

सितम्बर 19, 2010

;मन की बुझी ना प्यास तेरे दीदार की
मन का था भ्रम या हद थी प्यार की ।

क्यूँ नहीं समझता ये दिल अपनी हदों कों
किया सब जो थी मेरी कूवत अख्तियार की।

जिद में क्यूँ कर बैठा तू ऐसी खता
कर दी बदनामी खुद ही अपने प्यार की ।

सुर्खरू हो जाता है तन-मन तुझे देख कर
सुध-बुध नही रही इसे अब संसार की ।

हर तमन्ना में बस तमन्ना है तेरे दीद की
कयामत की हद बना रखी है इंतजार की ।

जमाना चाहे जितने कांटे बिछा दे राहों में
कमलेश 'जीत आखिर होगी मेरे प्यार की ॥